​जो जैसा मानता है, वह वैसा ही बन पाता है।

Write by: Chandan Jat | 11 June 17
​हम जो भी कार्य करते है। वह सबसे पहले हमारे दिमाग में होता हैं और बाद में हम उस कार्य को कर पाते हैं। दिमाग में किये बगैर छोटे से छोटे कार्य को सही ढग से कर पाना नामुमकिन हैं।
एक व्यक्ति के दिमाग में, एक दिन में हजारो विचार आते है। जैसी घटना हमारे साथ घटती हैं, वैसे ही विचार हमारे दिमाग में आते रहते हैं। विचार कैसे भी हो सकते हैं, सकरात्मक भी हो सकते हैं नकारत्मक भी हो सकते हैं। निर्भर हमारे ऊपर करता हैं, की हम उसमे से कीन विचारों को मानते हैं। और किनको नहीं। जैसा हम मानते है वैसा ही हम बन जाते है। अगर हम मान लें की हम कुछ कर ही नहीं सकते, तो हम कुछ कर भी नहीं पायेगे। और ठान लें की हम कुछ भी कर सकते हैं, तो हम कुछ भी कर सकते हैं। जो भी कार्य को करने का निर्णय किया हैं, उसके बारे में सोचते रहने से अच्छा हैं, उसकी शुरुआत कर देना। सोचता तो हर कोई हैं, लेकिन जो शुरुआत कर देता हैं वही कुछ कर पाता हैं। सोचने से और प्लान बनाने से कुछ भी हासिल नहीं होता हैं, अगर कुछ करके दिखाना हैं तो जितना जल्दी हो, जो भी कार्य करने की सोची है उसकी शुरुआत कर दीजिये। एक सही शुरुआत करना यानि आधा कार्य करना। नहीं तो पुरे जीवन बैठकर सोचते रहो, प्लान बनाते रहो। ज्यादा सोचना भी गलत है वह ज्यादा प्लान बनाना भी गलत हैं। जबतक कुछ करेंगे नहीं तब तक कैसे मालूम चलेगा की प्लान सही हैं या ग़लत। और जब हम किसी भी कार्य को करने लग जाते हैं। तब हमें हमारे प्लान के बारे में पत्ता चलता हैं की वह सही हैं नहीं। और अगर प्लान सही नहीं हैं तो उसमें कुछ बदलाव भी कर सकते हैं। किसी कार्य को जब हम करने लग जाते हैं, तो उस कार्य के बारे में और ज्यादा जानने लग जाते हैं। और उसी कार्य को जितनी बार करेंगे उतने ही उसके मास्टर बंननेगे। हर पल अपने कार्य को बेहतर बनाने के लिये कार्य करते रहोगे तो, सफल होने से कोई रोक नहीं सकता।